NAI SUBEH

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लंकादहन

दोहा : कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥24॥   भावार्थ:-मैं सबको समझाकर कहता हूँ कि बंदर की ममता पूँछ पर होती है। अतः तेल में कपड़ा डुबोकर उसे इसकी पूँछ में…

हनुमान्‌-रावण संवाद

दोहा : कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिसाद॥20॥   भावार्थ:-हनुमान्‌जी को देखकर रावण दुर्वचन कहता हुआ खूब हँसा। फिर पुत्र वध का स्मरण किया तो उसके हृदय में विषाद उत्पन्न हो गया॥20॥  …

हनुमान्‌जी द्वारा अशोक वाटिका विध्वंस, अक्षय कुमार वध और मेघनाद का हनुमान्‌जी को नागपाश में बाँधकर सभा में ले जाना

दोहा : देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥17॥   भावार्थ:-हनुमान्‌जी को बुद्धि और बल में निपुण देखकर जानकीजी ने कहा- जाओ। हे तात! श्री रघुनाथजी के चरणों को हृदय में धारण…

श्री सीता-हनुमान्‌ संवाद

सोरठा : कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥12॥   भावार्थ:-तब हनुमान्‌जी ने हदय में विचार कर (सीताजी के सामने) अँगूठी डाल दी, मानो अशोक ने अंगारा दे दिया। (यह समझकर) सीताजी…

श्री सीता-त्रिजटा संवाद

दोहा : जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥11॥   भावार्थ : तब (इसके बाद) वे सब जहाँ-तहाँ चली गईं। सीताजी मन में सोच करने लगीं कि एक महीना बीत जाने पर…

हनुमान्‌जी का अशोक वाटिका में सीताजी को देखकर दुःखी होना और रावण का सीताजी को भय दिखलाना

जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवन सुत बिदा कराई॥करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ॥3॥   भावार्थ : विभीषणजी ने (माता के दर्शन की) सब युक्तियाँ (उपाय) कह सुनाईं। तब हनुमान्‌जी विदा लेकर चले। फिर वही…

हनुमान्‌-विभीषण संवाद

दोहा : रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराई॥5॥   भावार्थ : वह महल श्री रामजी के आयुध (धनुष-बाण) के चिह्नों से अंकित था, उसकी शोभा वर्णन नहीं की जा सकती। वहाँ नवीन-नवीन तुलसी…

लंका वर्णन, लंकिनी वध, लंका में प्रवेश

नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए॥सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥4॥   भावार्थ : अनेकों प्रकार के वृक्ष फल-फूल से शोभित हैं। पक्षी और पशुओं के समूह को देखकर तो…

हनुमान्‌जी का लंका को प्रस्थान, सुरसा से भेंट, छाया पकड़ने वाली राक्षसी का वध

चौपाई : जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥1॥   भावार्थ : जाम्बवान्‌ के सुंदर वचन सुनकर हनुमान्‌जी के हृदय को बहुत ही भाए। (वे बोले-) हे…

अच्छा वक्ता एवं अच्छा श्रोता

श्रीरामचरित मानस की रचना गोस्वामी तुलसीदास ने की थी। इस ग्रंथ की शुरुआत में तुलसीदासजी ने लिखा है, ‘जिस रामकथा को मैं सुना रहा हूं, वो सबसे पहले शिवजी ने तैयार करके अपने मस्तिष्क में रखी थी। इसके बाद समय…