NAI SUBEH
वानरों और निषाद की विदाई

दोहा : ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति।जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति॥15॥ भावार्थ:-वानर सब ब्रह्मानंद में मग्न हैं। प्रभु के चरणों में सबका प्रेम है। उन्होंने दिन जाते जाने ही नहीं और (बात…

दोहा : ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति।जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति॥15॥ भावार्थ:-वानर सब ब्रह्मानंद में मग्न हैं। प्रभु के चरणों में सबका प्रेम है। उन्होंने दिन जाते जाने ही नहीं और (बात…

चौपाई : अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई॥राम कहा सेवकन्ह बुलाई। प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई॥1॥ भावार्थ:-अवधपुरी बहुत ही सुंदर सजाई गई। देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की झड़ी लगा दी। श्री रामचंद्रजी ने सेवकों को बुलाकर…

दोहा : आवत देखि लोग सब कृपासिंधु भगवान।नगर निकट प्रभु प्रेरेउ उतरेउ भूमि बिमान॥4 क॥ भावार्थ:-कृपा सागर भगवान् श्री रामचंद्रजी ने सब लोगों को आते देखा, तो प्रभु ने विमान को नगर के समीप उतरने की प्रेरणा की। तब…

दोहा : रहा एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग।जहँ तहँ सोचहिं नारि नर कृस तन राम बियोग॥ भावार्थ:-श्री रामजी के लौटने की अवधि का एक ही दिन बाकी रह गया, अतएव नगर के लोग बहुत आतुर (अधीर)…

श्लोक : केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नंशोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्।पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं।नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम्॥1। भावार्थ:-मोर के कण्ठ की आभा के समान (हरिताभ) नीलवर्ण, देवताओं में श्रेष्ठ, ब्राह्मण (भृगुजी) के चरणकमल के चिह्न से सुशोभित, शोभा से पूर्ण, पीताम्बरधारी,…

दोहा : प्रभु प्रेरित कपि भालु सब राम रूप उर राखि।हरष बिषाद सहित चले बिनय बिबिध बिधि भाषि॥118 क॥ भावार्थ:-परन्तु प्रभु की प्रेरणा (आज्ञा) से सब वानर-भालू श्री रामजी के रूप को हृदय में रखकर और अनेकों प्रकार से…

बहुरि विभीषन भवन सिधायो। मनि गन बसन बिमान भरायो॥लै पुष्पक प्रभु आगें राखा। हँसि करि कृपासिंधु तब भाषा॥2॥ भावार्थ:-फिर विभीषणजी महल को गए और उन्होंने मणियों के समूहों (रत्नों) से और वस्त्रों से विमान को भर लिया। फिर उस…

चौपाई : करि बिनती जब संभु सिधाए। तब प्रभु निकट बिभीषनु आए॥नाइ चरन सिरु कह मृदु बानी। बिनय सुनहु प्रभु सारँगपानी॥1॥ भावार्थ:-जब शिवजी विनती करके चले गए, तब विभीषणजी प्रभु के पास आए और चरणों में सिर नवाकर कोमल…

दोहा : बरषहिं सुमन हरषि सुर बाजहिं गगन निसान।गावहिं किंनर सुरबधू नाचहिं चढ़ीं बिमान॥109 क॥ भावार्थ:-देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे। आकाश में डंके बजने लगे। किन्नर गाने लगे। विमानों पर चढ़ी अप्सराएँ नाचने लगीं॥109 (क)॥ जनकसुता समेत…

चौपाई : पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना। लंका जाहु कहेउ भगवाना॥समाचार जानकिहि सुनावहु। तासु कुसल लै तुम्ह चलि आवहु॥1॥ भावार्थ:-फिर प्रभु ने हनुमान्जी को बुला लिया। भगवान् ने कहा- तुम लंका जाओ। जानकी को सब समाचार सुनाओ और उसका…