NAI SUBEH

NAI SUBEH

9 ग्रहों की सरल पौराणिक जानकारी

ज्योतिष के अनुसार ग्रह की परिभाषा अलग है। भारतीय ज्योतिष और पौराणिक कथाओं में 9 ग्रह गिने जाते हैं, सूर्य, चंद्रमा, बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, राहु और केतु।   सूर्य : सात घो़ड़े खींचते हैं सूर्य रथ को। यह…

पूर्ण तितली आसन ( Full butterfly posture)

प्रारम्भिक स्थिति में बैठ जायें। घुटनों को मोड़ें और पैरों के तलवों को एक साथ मिलायें। जितना सम्भव हो एडियों को शरीर के निकट लायें। भीतरी जांध की पेशियों को पूर्णत: ढीला छोड़ दें।चरण 1: दोनों हाथों से पंजों को…

||  राम कथा के भगीरथ बाल्मीकि ||

शिवपुराण में कहा गया है कि दयालु मनुष्य, अभिमानशून्य व्यक्ति, परोपकारी और जितेंद्रीय ये चार पवित्र स्तंभ हैं, जो इस पृथ्वी को धारण किए हुए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ये चारों गुण एक साथ मर्यादा पुरुषोत्तम राम के…

||  तुलसी दास  ||

प्रयाग के पास बाँदा जिले में राणापुर नामक एक ग्राम है। वहाँ आत्माराम दुबे नाम के एक प्रतिष्ठित सरयूपारीण ब्राह्मण रहते थे। उनकी धर्मपत्नी का नाम हुलसी था। संवत्‌ 1554 की श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन अभुक्त मूल नक्षत्र में…

रामायण माहात्म्य, तुलसी विनय और फलस्तुति

पूँछिहु राम कथा अति पावनि। सुक सनकादि संभु मन भावनि॥सत संगति दुर्लभ संसारा। निमिष दंड भरि एकउ बारा॥3॥   भावार्थ:-जो आपने मुझ से शुकदेवजी, सनकादि और शिवजी के मन को प्रिय लगने वाली अति पवित्र रामकथा पूछी। संसार में घड़ी…

भजन महिमा

चौपाई : रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी॥एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं॥4॥   भावार्थ:-श्री रघुनाथजी की भक्ति संजीवनी जड़ी है। श्रद्धा से पूर्ण बुद्धि ही अनुपान (दवा के साथ लिया जाने…

गरुड़जी के सात प्रश्न तथा काकभुशुण्डि के उत्तर

चौपाई : पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ॥।नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न मम कहहु बखानी॥1॥   भावार्थ:-पक्षीराज गरुड़जी फिर प्रेम सहित बोले- हे कृपालु! यदि मुझ पर आपका प्रेम है, तो हे नाथ! मुझे अपना…

ज्ञान-भक्ति-निरुपण, ज्ञान-दीपक और भक्ति की महान्‌ महिमा

भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप।मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप॥114 ख॥   भावार्थ:-मैं हठ करके भक्ति पक्ष पर अड़ा रहा, जिससे महर्षि लोमश ने मुझे शाप दिया, परंतु उसका फल यह हुआ कि जो मुनियों को…

काकभुशुण्डिजी का लोमशजी के पास जाना और शाप तथा अनुग्रह पाना

दोहा : गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग।रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग॥110 क॥   भावार्थ:-गुरुजी के वचनों का स्मरण करके मेरा मन श्री रामजी के चरणों में लग गया। मैं क्षण-क्षण नया-नया प्रेम प्राप्त…

गुरुजी का शिवजी से अपराध क्षमापन, शापानुग्रह और काकभुशुण्डि की आगे की कथा

दोहा : सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि बिप्र अनुरागु।पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु॥108 क॥   भावार्थ:-सर्वज्ञ शिवजी ने विनती सुनी और ब्राह्मण का प्रेम देखा। तब मंदिर में आकाशवाणी हुई कि हे द्विजश्रेष्ठ! वर माँगो॥108 (क)॥   जौं…