NAI SUBEH

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अरण्यकाण्ड

अरण्यकाण्ड अरण्यकाण्ड में शूर्पणखा वध से सीता हरण प्रकरण तक के घटनाक्रम आते हैं। नीचे अरण्यकाण्ड से जुड़े घटनाक्रमों की विषय सूची दी गई है। आप जिस भी घटना के बारे में पढ़ना चाहते हैं उसकी लिंक पर क्लिक करें।…

भरतजी का अयोध्या लौटना, भरतजी द्वारा पादुका की स्थापना, नन्दिग्राम में निवास और श्री भरतजी के चरित्र श्रवण की महिमा

दोहा : सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर।भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर॥321॥   भावार्थ:-छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजी समेत प्रभु श्री रामचंद्रजी पर्णकुटी में ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो वैराग्य, भक्ति और ज्ञान शरीर धारण कर…

श्री राम-भरत-संवाद, पादुका प्रदान, भरतजी की बिदाई

चौपाई : भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू॥भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं॥1॥   भावार्थ:-(अगले छठे दिन) सबेरे स्नान करके भरतजी, ब्राह्मण, राजा जनक और सारा समाज आ जुटा। आज सबको विदा करने…

भरतजी का तीर्थ जल स्थापन तथा चित्रकूट भ्रमण

दोहा : अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप।राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप॥309॥   भावार्थ:-तब अत्रिजी ने भरतजी से कहा- इस पर्वत के समीप ही एक सुंदर कुआँ है। इस पवित्र, अनुपम और अमृत जैसे तीर्थजल को…

श्री राम-भरत संवाद

दोहा : राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न ऊतरु देत॥296॥   भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी की शपथ सुनकर सभा समेत मुनि और जनकजी सकुचा गए (स्तम्भित रह गए)। किसी से उत्तर देते नहीं बनता, सब…

जनक-वशिष्ठादि संवाद, इंद्र की चिंता, सरस्वती का इंद्र को समझाना

आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ। भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ॥करि प्रनामु तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए॥3॥   भावार्थ:-अतः आप आश्रम को पधारिए। इतना कह मुनिराज स्नेह से शिथिल हो गए। तब श्री रामजी प्रणाम करके चले गए और…

जनक-सुनयना संवाद, भरतजी की महिमा

दोहा : बार बार मिलि भेंटि सिय बिदा कीन्हि सनमानि।कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि॥287॥   भावार्थ:-राजा-रानी ने बार-बार मिलकर और हृदय से लगाकर तथा सम्मान करके सीताजी को विदा किया। चतुर रानी ने समय पाकर राजा से…

कौसल्या सुनयना-संवाद, श्री सीताजी का शील

दोहा : एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु॥280॥   भावार्थ:-सब लोग कह रहे हैं कि हम इस सुख के योग्य नहीं हैं, हमारे ऐसे भाग्य कहाँ? दोनों समाजों का श्री…

जनकजी का पहुँचना, कोल किरातादि की भेंट, सबका परस्पर मिलाप

दोहा : प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु।सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु॥274॥   भावार्थ:-उस समय सब लोग प्रेम में मग्न हैं। इतने में ही मिथिलापति जनकजी को आते हुए सुनकर सूर्यकुल रूपी कमल के सूर्य श्री…

श्री राम-भरतादि का संवाद

दोहा : भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि।करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि॥258॥   भावार्थ:-पहले भरत की विनती आदरपूर्वक सुन लीजिए, फिर उस पर विचार कीजिए। तब साधुमत, लोकमत, राजनीति और वेदों का निचोड़ (सार) निकालकर वैसा ही (उसी…