NAI SUBEH
श्री वशिष्ठजी का भाषण

दोहा : गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ।बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ॥253॥ भावार्थ:-भरतजी गुरु के चरणकमलों में प्रणाम करके आज्ञा पाकर बैठ गए। उसी समय ब्राह्मण, महाजन, मंत्री आदि सभी सभासद आकर जुट गए॥253॥ …

दोहा : गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ।बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ॥253॥ भावार्थ:-भरतजी गुरु के चरणकमलों में प्रणाम करके आज्ञा पाकर बैठ गए। उसी समय ब्राह्मण, महाजन, मंत्री आदि सभी सभासद आकर जुट गए॥253॥ …

दोहा : सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भृंग।बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग॥249॥ भावार्थ:-तालाबों में कमल खिल रहे हैं, जल के पक्षी कूज रहे हैं, भौंरे गुंजार कर रहे हैं और बहुत रंगों के पक्षी और पशु…

लखन राम सियँ सुनि सुर बानी। अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी॥इहाँ भरतु सब सहित सहाए। मंदाकिनीं पुनीत नहाए॥2॥ भावार्थ:-लक्ष्मणजी, श्री रामचंद्रजी और सीताजी ने देवताओं की वाणी सुनकर अत्यंत सुख पाया, जो वर्णन नहीं किया जा सकता। यहाँ…

सुनि सुर बचन लखन सकुचाने। राम सीयँ सादर सनमाने॥कही तात तुम्ह नीति सुहाई। सब तें कठिन राजमदु भाई॥3॥ भावार्थ:-देववाणी सुनकर लक्ष्मणजी सकुचा गए। श्री रामचंद्रजी और सीताजी ने उनका आदर के साथ सम्मान किया (और कहा-) हे तात! तुमने…

उहाँ रामु रजनी अवसेषा। जागे सीयँ सपन अस देखा॥सहित समाज भरत जनु आए। नाथ बियोग ताप तन ताए॥2॥ भावार्थ:-उधर श्री रामचंद्रजी रात शेष रहते ही जागे। रात को सीताजी ने ऐसा स्वप्न देखा (जिसे वे श्री रामचंद्रजी को सुनाने…

एहि बिधि भरत चले मग जाहीं। दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं॥जबहि रामु कहि लेहिं उसासा। उमगत प्रेमु मनहुँ चहु पासा॥3॥ भावार्थ:-इस प्रकार भरतजी मार्ग में चले जा रहे हैं। उनकी (प्रेममयी) दशा देखकर मुनि और सिद्ध लोग भी सिहाते…

देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू॥गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेंट न होई॥4॥ भावार्थ:-भरतजी के (इस प्रेम के) प्रभाव को देखकर देवराज इन्द्र को सोच हो गया (कि कहीं इनके प्रेमवश श्री…

दोहा : करि प्रबोधु मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु।कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु॥212॥ भावार्थ:-इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजी ने उनका समाधान करके कहा- अब आप लोग हमारे प्रेम प्रिय अतिथि बनिए और कृपा करके कंद-मूल, फल-फूल…

दोहा : भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग।कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग॥203॥ भावार्थ:-प्रेम में उमँग-उमँगकर सीताराम-सीताराम कहते हुए भरतजी ने तीसरे पहर प्रयाग में प्रवेश किया॥203॥ चौपाई : झलका झलकत पायन्ह कैसें। पंकज कोस…

दोहा : करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ।मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेमु न हृदयँ समाइ॥193॥ भावार्थ:-दण्डवत करते देखकर भरतजी ने उठाकर उसको छाती से लगा लिया। हृदय में प्रेम समाता नहीं है, मानो स्वयं लक्ष्मणजी से…