NAI SUBEH

NAI SUBEH

निषाद की शंका और सावधानी

चौपाई : सई तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने॥समाचार सब सुने निषादा। हृदयँ बिचार करइ सबिषादा॥1॥   भावार्थ:-रात भर सई नदी के तीर पर निवास करके सबेरे वहाँ से चल दिए और सब श्रृंगवेरपुर के समीप जा पहुँचे। निषादराज…

अयोध्यावासियों सहित श्री भरत-शत्रुघ्न आदि का वनगमन

दोहा : जरउ सो संपति सदन सुखु सुहृद मातु पितु भाइ।सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ॥185॥   भावार्थ:-वह सम्पत्ति, घर, सुख, मित्र, माता, पिता, भाई जल जाए जो श्री रामजी के चरणों के सम्मुख होने में हँसते…

वशिष्ठ-भरत संवाद, श्री रामजी को लाने के लिए चित्रकूट जाने की तैयारी

दोहा : तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु।उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु॥169॥   भावार्थ:-(वशिष्ठजी ने कहा-) हे तात! हृदय में धीरज धरो और आज जिस कार्य के करने का अवसर है, उसे करो। गुरुजी…

भरत-कौसल्या संवाद और दशरथजी की अन्त्येष्टि क्रिया

दोहा : मलिन बसन बिबरन बिकल कृस शरीर दुख भार।कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार॥163॥   भावार्थ:-कौसल्याजी मैले वस्त्र पहने हैं, चेहरे का रंग बदला हुआ है, व्याकुल हो रही हैं, दुःख के बोझ से शरीर सूख गया…

श्री भरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक

हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी॥आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि॥1॥   भावार्थ:-बाजार और रास्ते देखे नहीं जाते। मानो नगर में दसों दिशाओं में दावाग्नि लगी है! पुत्र को आते सुनकर सूर्यकुल रूपी…

मुनि वशिष्ठ का भरतजी को बुलाने के लिए दूत भेजना

दोहा : तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास।सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास॥156॥   भावार्थ:-तब वशिष्ठ मुनि ने समय के अनुकूल अनेक इतिहास कहकर अपने विज्ञान के प्रकाश से सबका शोक दूर किया॥156॥   चौपाई : तेल…

दशरथ-सुमन्त्र संवाद, दशरथ मरण

दोहा : देखि सचिवँ जय जीव कहि कीन्हेउ दंड प्रनामु।सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहँ रामु॥148॥   भावार्थ:-मंत्री ने देखकर ‘जयजीव’ कहकर दण्डवत्‌ प्रणाम किया। सुनते ही राजा व्याकुल होकर उठे और बोले- सुमंत्र! कहो, राम कहाँ हैं ?॥148॥…

सुमन्त्र का अयोध्या को लौटना और सर्वत्र शोक देखना

दोहा : भयउ निषादु बिषादबस देखत सचिव तुरंग।बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग॥143॥   भावार्थ:-मंत्री और घोड़ों की यह दशा देखकर निषादराज विषाद के वश हो गया। तब उसने अपने चार उत्तम सेवक बुलाकर सारथी के साथ कर दिए॥143॥…

चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों के द्वारा सेवा

दोहा : चित्रकूट महिमा अमित कही महामुनि गाइ।आइ नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ॥132॥   भावार्थ:-महामुनि वाल्मीकिजी ने चित्रकूट की अपरिमित महिमा बखान कर कही। तब सीताजी सहित दोनों भाइयों ने आकर श्रेष्ठ नदी मंदाकिनी में स्नान किया॥132॥  …

श्री राम-वाल्मीकि संवाद

देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीकि आश्रम प्रभु आए॥राम दीख मुनि बासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन॥3॥   भावार्थ:-सुंदर वन, तालाब और पर्वत देखते हुए प्रभु श्री रामचन्द्रजी वाल्मीकिजी के आश्रम में आए। श्री रामचन्द्रजी ने देखा कि मुनि…