NAI SUBEH

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पुरुषोत्तमयोग- पंद्रहवाँ अध्याय

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अथ पञ्चदशोऽध्यायः- पुरुषोत्तमयोग (संसार वृक्ष का कथन और भगवत्प्राप्ति का उपाय) श्रीभगवानुवाच   ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्‌ ।छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌ ॥   भावार्थ : श्री भगवान बोले- आदिपुरुष परमेश्वर रूप मूल वाले (आदिपुरुष नारायण वासुदेव भगवान ही…

गुणत्रयविभागयोग- चौदहवाँ अध्याय

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अथ चतुर्दशोऽध्यायः- गुणत्रयविभागयोग (ज्ञान की महिमा और प्रकृति-पुरुष से जगत्‌ की उत्पत्ति) श्रीभगवानुवाच   परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानं मानमुत्तमम्‌ । यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥   भावार्थ : श्री भगवान बोले- ज्ञानों में भी अतिउत्तम उस परम ज्ञान को…

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग- तेरहवाँ अध्याय

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अथ त्रयोदशोsध्याय: श्रीभगवानुवाच (ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विषय) श्रीभगवानुवाच   इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥   भावार्थ : श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! यह शरीर ‘क्षेत्र’ (जैसे खेत में बोए हुए बीजों का उनके अनुरूप फल…

भक्तियोग- बारहवाँ अध्याय

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अथ द्वादशोऽध्यायः- भक्तियोग (साकार और निराकार के उपासकों की उत्तमता का निर्णय और भगवत्प्राप्ति के उपाय का विषय) अर्जुन उवाच   एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥   भावार्थ : अर्जुन बोले- जो अनन्य प्रेमी…

विश्वरूपदर्शनयोग- ग्यारहवाँ अध्याय

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अथैकादशोऽध्यायः- विश्वरूपदर्शनयोग ( विश्वरूप के दर्शन हेतु अर्जुन की प्रार्थना ) अर्जुन उवाच   मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम्‌ ।यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥   भावार्थ : अर्जुन बोले- मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक…

विभूतियोग- दसवाँ अध्याय

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  अथ दशमोऽध्याय:- विभूतियोग ( भगवान की विभूति और योगशक्ति का कथन तथा उनके जानने का फल) श्रीभगवानुवाच   भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः ।यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥   भावार्थ : श्री भगवान्‌ बोले- हे महाबाहो! फिर…

जयमाला पहनाना, परशुराम का आगमन व क्रोध

दोहा : बंदी मागध सूतगन बिरुद बदहिं मतिधीर।करहिं निछावरि लोग सब हय गय धन मनि चीर॥262॥   भावार्थ:-धीर बुद्धि वाले, भाट, मागध और सूत लोग विरुदावली (कीर्ति) का बखान कर रहे हैं। सब लोग घोड़े, हाथी, धन, मणि और वस्त्र…

धनुषभंग

दोहा : राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि।चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि॥260॥   भावार्थ:-श्री रामजी ने सब लोगों की ओर देखा और उन्हें चित्र में लिखे हुए से देखकर फिर कृपाधाम श्री रामजी ने सीताजी की ओर…

श्री लक्ष्मणजी का क्रोध

जनक बचन सुनि सब नर नारी। देखि जानकिहि भए दुखारी॥माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें। रदपट फरकत नयन रिसौंहें॥4॥   भावार्थ:-जनक के वचन सुनकर सभी स्त्री-पुरुष जानकीजी की ओर देखकर दुःखी हुए, परन्तु लक्ष्मणजी तमतमा उठे, उनकी भौंहें टेढ़ी हो गईं,…

बंदीजनों द्वारा जनकप्रतिज्ञा की घोषणा राजाओं से धनुष न उठना, जनक की निराशाजनक वाणी

तब बंदीजन जनक बोलाए। बिरिदावली कहत चलि आए॥कह नृपु जाइ कहहु पन मोरा। चले भाट हियँ हरषु न थोरा॥4॥   भावार्थ:-तब राजा जनक ने वंदीजनों (भाटों) को बुलाया। वे विरुदावली (वंश की कीर्ति) गाते हुए चले आए। राजा ने कहा-…