NAI SUBEH

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पुष्पवाटिका-निरीक्षण, सीताजी का प्रथम दर्शन, श्री सीता-रामजी का परस्पर दर्शन

दोहा : उठे लखनु निसि बिगत सुनि अरुनसिखा धुनि कान।गुर तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान॥226॥   भावार्थ:-रात बीतने पर, मुर्गे का शब्द कानों से सुनकर लक्ष्मणजी उठे। जगत के स्वामी सुजान श्री रामचन्द्रजी भी गुरु से पहले ही जाग…

श्री राम-लक्ष्मण का जनकपुर निरीक्षण

दोहा : जाइ देखि आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाइ।करहु सुफल सब के नयन सुंदर बदन देखाइ॥218॥   भावार्थ:-सुख के निधान दोनों भाई जाकर नगर देख आओ। अपने सुंदर मुख दिखलाकर सब (नगर निवासियों) के नेत्रों को सफल करो॥218॥  …

राजविद्याराजगुह्ययोग- नौवाँ अध्याय

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अथ नवमोऽध्यायः- राजविद्याराजगुह्ययोग ( प्रभावसहित ज्ञान का विषय ) श्रीभगवानुवाच   इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌ ॥   भावार्थ : श्री भगवान बोले- तुझ दोषदृष्टिरहित भक्त के लिए इस परम गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान को पुनः भली…

अक्षरब्रह्मयोग- आठवाँ अध्याय

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अथाष्टमोऽध्यायः- अक्षरब्रह्मयोग ( ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर ) अर्जुन उवाच   किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं पुरुषोत्तम ।अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥   भावार्थ : अर्जुन ने कहा- हे पुरुषोत्तम! वह…

ज्ञानविज्ञानयोग- सातवाँ अध्याय

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अथ सप्तमोऽध्यायः- ज्ञानविज्ञानयोग ( विज्ञान सहित ज्ञान का विषय ) श्रीभगवानुवाच   मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥   भावार्थ : श्री भगवान बोले- हे पार्थ! अनन्य प्रेम से मुझमें आसक्त चित तथा अनन्य भाव से…

आत्मसंयमयोग- छठा अध्याय

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अथ षष्ठोऽध्यायः- आत्मसंयमयोग ( कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ पुरुष के लक्षण ) श्रीभगवानुवाच   अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥   भावार्थ : श्री भगवान बोले- जो पुरुष कर्मफल का…

कर्मसंन्यासयोग- पाँचवाँ अध्याय

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अथ पंचमोऽध्यायः- कर्मसंन्यासयोग ( सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय ) श्रीभगवानुवाच   सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्‌ ॥   भावार्थ : अर्जुन बोले- हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास की और फिर कर्मयोग की…

ज्ञानकर्मसंन्यासयोग- चौथा अध्याय

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अथ चतुर्थोऽध्यायः- ज्ञानकर्मसंन्यासयोग ( सगुण भगवान का प्रभाव और कर्मयोग का विषय ) श्री भगवानुवाच   इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌ ।विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌ ॥   भावार्थ : श्री भगवान बोले- मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य…

श्री राम-लक्ष्मण को देखकर जनकजी की प्रेम मुग्धता

श्री राम-लक्ष्मण को देखकर जनकजी की प्रेम मुग्धता दोहा : प्रेम मगन मनु जानि नृपु करि बिबेकु धरि धीर।बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर॥215॥   भावार्थ:-मन को प्रेम में मग्न जान राजा जनक ने विवेक का आश्रय लेकर…

श्री राम-लक्ष्मण सहित विश्वामित्र का जनकपुर में प्रवेश

  श्री राम-लक्ष्मण सहित विश्वामित्र का जनकपुर में प्रवेश चौपाई : चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा॥गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि आई॥1॥   भावार्थ:-श्री रामजी और लक्ष्मणजी मुनि के साथ चले। वे वहाँ…