NAI SUBEH

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क्या आपको पता है हिंदू धर्म में सोलह संस्कार कौन कौन से हैं क्या है उनके महत्त्व?

संस्कार का अर्थ क्या है ? सनातन परंपरा में हम यह जानते हैं की मनुष्य विभिन्न योनियों से अपनी यात्रा करते हुए वर्तमान जीवन में जन्म लिया है इसकी वजह से हमारे चित, मन पर जो पिछले जन्मो के पाप…

अहल्या उद्धार

आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं॥पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कहा बिसेषी॥6॥   भावार्थ:-मार्ग में एक आश्रम दिखाई पड़ा। वहाँ पशु-पक्षी, को भी जीव-जन्तु नहीं था। पत्थर की एक शिला को देखकर…

विश्वामित्र-यज्ञ की रक्षा

दोहा : आयुध सर्ब समर्पि कै प्रभु निज आश्रम आनि।कंद मूल फल भोजन दीन्ह भगति हित जानि॥209॥   भावार्थ:-सब अस्त्र-शस्त्र समर्पण करके मुनि प्रभु श्री रामजी को अपने आश्रम में ले आए और उन्हें परम हितू जानकर भक्तिपूर्वक कंद, मूल…

विश्वामित्र का राजा दशरथ से राम-लक्ष्मण को माँगना, ताड़का वध

दोहा : ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप।भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप॥205॥   भावार्थ:-जो व्यापक, अकल (निरवयव), इच्छारहित, अजन्मा और निर्गुण है तथा जिनका न नाम है न रूप, वही भगवान भक्तों के लिए नाना प्रकार…

कर्मयोग- तीसरा अध्याय

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अथ तृतीयोऽध्यायः- कर्मयोग (ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरूपण) अर्जुन उवाच   ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥   भावार्थ : अर्जुन बोले- हे जनार्दन! यदि आपको…

सांख्ययोग- नामक दूसरा अध्याय

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अथ द्वितीयोऽध्यायः- सांख्ययोग ( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद ) संजय उवाच   तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्‌ ।विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥   भावार्थ : संजय बोले- उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले…

अर्जुनविषादयोग- पहला अध्याय

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अथ प्रथमोऽध्यायः- अर्जुनविषादयोग श्रीमद्‍भगवद्‍गीता का महत्व कल्याण की इच्छा वाले मनुष्यों को उचित है कि मोह का त्याग कर अतिशय श्रद्धा-भक्तिपूर्वक अपने बच्चों को अर्थ और भाव के साथ श्रीगीताजी का अध्ययन कराएँ। स्वयं भी इसका पठन और मनन करते हुए…

क्या आप जानते हैं, किस देवता को कौन सा फूल पसंद है?

हिंदू धर्म में विभिन्न फूलों का विशेष महत्व है। धार्मिक अनुष्ठान, पूजन, आरती आदि कार्य बिना फूल के अधूरे ही माने जाते हैं। फूलों के संबंध में शारदा तिलक नामक पुस्तक में कहा गया है-दैवस्य मस्तकं कुर्यात्कुसुमोपहितं सदा।   अर्थात- देवता का…

श्री भगवान्‌ का प्राकट्य और बाललीला का आनंद

श्री भगवान्‌ का प्राकट्य और बाललीला का आनंद दोहा : जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल।चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल॥190॥   भावार्थ:-योग, लग्न, ग्रह, वार और तिथि सभी अनुकूल हो गए। जड़ और चेतन सब हर्ष…

राजा दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ, रानियों का गर्भवती होना

राजा दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ, रानियों का गर्भवती होना गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी। रहे निज निज अनीक रचि रूरी॥यह सब रुचिर चरित मैं भाषा। अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा॥3॥   भावार्थ:-वे (वानर) पर्वतों और जंगलों में जहाँ-तहाँ…