NAI SUBEH

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मानस निर्माण की तिथि

मानस निर्माण की तिथि सादर सिवहि नाइ अब माथा। बरनउँ बिसद राम गुन गाथा॥संबत सोरह सै एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा॥2॥   भावार्थ:-अब मैं आदरपूर्वक श्री शिवजी को सिर नवाकर श्री रामचन्द्रजी के गुणों की निर्मल कथा कहता…

श्री रामगुण और श्री रामचरित्‌ की महिमा

श्री रामगुण और श्री रामचरित्‌ की महिमा मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो। निज दिसि देखि दयानिधि पोसो॥2॥   भावार्थ:-वे (श्री रामजी) मेरी (बिगड़ी) सब तरह से सुधार लेंगे, जिनकी कृपा कृपा करने…

श्री नाम वंदना और नाम महिमा

श्री नाम वंदना और नाम महिमा चौपाई : बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥1॥   भावार्थ:-मैं श्री रघुनाथजी के नाम ‘राम’ की वंदना करता हूँ, जो…

जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने खाया एक गरीब भारतीय लड़की का झूठा चावल

मीराबाई चानू की कहानी है यह। इस सत्य घटना को पढ़ने के बाद शब्द ही नहीं बचे हैं मेरे पास कुछ भी टिप्पणी करने के लिए। बस हज़ार बार  कर सकता हूँ इस आदमी जिजीविषा वाली महान मीरा चानू को।…

जंगल के स्कूल की परीक्षा का परिणाम 

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एक बार की बात है जंगल के राजा शेर ने ऐलान कर दिया कि अब आज के बाद कोई अनपढ़ न रहेगा। हर पशु को अपना बच्चा स्कूल भेजना होगा। राजा साहब का स्कूल पढ़ा-लिखाकर सबको प्रमाड़-पत्र  बँटेगा।     सब…

श्री सीताराम-धाम-परिकर वंदना

श्री सीताराम-धाम-परिकर वंदना चौपाई : बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि॥प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी॥1॥   भावार्थ:-मैं अति पवित्र श्री अयोध्यापुरी और कलियुग के पापों का नाश करने वाली श्री…

वाल्मीकि, वेद, ब्रह्मा, देवता, शिव, पार्वती आदि की वंदना

वाल्मीकि, वेद, ब्रह्मा, देवता, शिव, पार्वती आदि की वंदना सोरठा : बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ।सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित॥14 घ॥   भावार्थ:-मैं उन वाल्मीकि मुनि के चरण कमलों की वंदना करता हूँ, जिन्होंने रामायण की…

कवि वंदना

कवि वंदना चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे॥कलि के कबिन्ह करउँ परनामा। जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा॥2॥   भावार्थ:-मैं उन सब (श्रेष्ठ कवियों) के चरणकमलों में प्रणाम करता हूँ, वे मेरे सब मनोरथों को पूरा करें। कलियुग…

तुलसीदासजी की दीनता और राम भक्तिमयी कविता की महिमा

तुलसीदासजी की दीनता और राम भक्तिमयी कविता की महिमा जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू॥निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब पाहीं॥2॥   भावार्थ:-मुझको अपना दास जानकर कृपा की खान आप सब लोग…

रामरूप से जीवमात्र की वंदना :

रामरूप से जीवमात्र की वंदना : जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि॥7(ग)॥   भावार्थ:-जगत में जितने जड़ और चेतन जीव हैं, सबको राममय जानकर मैं उन सबके चरणकमलों की सदा…